याद



कुछ अधूरापन सा लगता है,

जिंदगी में बिना तेरे

तेरे वो अनकहे लफ्ज़ अब भी

शोर करते हैं ज़ेहन में मेरे।


तू ना दिखे फिर भी,

मुझे दिखता रहता है

तेरा ही ज़िक्र सुबह शाम

चलता रहता है।


नींदों को भी हमने रुख़सत

कर दिया तेरी गलियों में

तेरी ही तलाश में दिल,

भटकता रहता है।


ये चाँद तारे, अब पुराने हो गए

हमें तो तू दुनिया के हर एक

ज़रे में दिखता है।


मज़ा आ रहा है

एकतरफ़ा आशिकी में,

तेरी यादों के लम्हों को

धुएं में उड़ाने में।


हर एक कश में,

तेरा ही तो नाम है

गवाही देने को

ये धुआं भी तैयार है।


हाँ,

मैं हूँ कुछ खोई-खोई

सी इस जहान में

ये नशे की बदौलत नहीं,

तुम्हारा सर चढ़ा सवार है।


अब घरवाले भी दूर

जाने लगे हैं मुझसे

इन आदतों से तंग

आने लगे हैं मुझसे।


अब तू ही बता दे मुझे

किसी और की सूरत में

कैसे देखूं तेरी शक्ल को

मैंने तो सपनों में भी

तेरे ही ख़्वाब बुने हैं।


लो मानो समझाया भी

हमने अपने नादान दिल को,

पर जो रह-रहकर तेरी


याद आ रही है,

तो कोई समझाए

मेरे कमज़ोर दिमाग को।




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