इंन्तजार




इंन्तजार है ऐसी जिन्दगी का,
जिसमें गम़ के सागरों के साथ
खुशी के लहरें भी होने का।

इंन्तजार है उस पल का,
जब उस चाॅंद की मुरत को
गर्व हो हमारें बेटी होने का।

इंन्तजार हैं इक ऐसे भाई का,
जो हर इक लड़की कोअपनी
बहन की नजर से देखें।

इंन्तजार हैं इक ऐसी मुस्कान का,
जिसे देखने पर मन कहें
यहिं थम जाए मेरा सारा जहाँ।

इंन्तजार हैं ऐसी दोस्ती का,
जो अनकहें समज जाती हों
मेरी हर इक बात को।

इंन्तजार हैं इक मुलाकात का,
जो दिल छुए और
पता भी ना चलें।

इंन्तजार हैं उस दिन का,
जब धर्म की चट्टानों
को तोडकर मानवता के
फ़िर इक बार उदय का।

द्वारा- साक्षी जोगदंड
ज. न. वि. बीड छात्र

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